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21.9.14

आग को शुक्रिया

देखो आग की लाल नीली जीभें. मुंह मत फेरो. मुस्कराओ, औपचारिकता दिखाओ. एक दिन ये आग तुम्हें अपनी गोदी में लेटाएगी. फ़िर इसकी जीभें तुम्हारे मांस को चाट चाट कर साफ़ कर देंगी. फ़िर तुम्हारी खोपड़ी, जो कपाल क्रिया से फोड़ डाली होगी तुम्हारे वंशज ने, उस में घुस ये खायेंगी तुम्हारी यादों को, तुम्हारे अनुभव को. कुछ भी नहीं छोड़ेंगी. अब बारी आयेगी तुम्हारी हड्डियों की. वो कुछ देर लड़ेंगी, पुरानी आदत जो ठहरी. पर फिर वो भी हथियार डाल देंगी. पिघल कर सिकुड़ जायेंगी और बचेगा बस छः मुठ्ठी का एक टुकड़ा तुम्हारी पेल्विक गरडल से चिपका. यही होगा तुम्हारे प्रिय शरीर का आख़री अंश. इसे गंगा में डाल दिया जाएगा मछलियों के कुतरने के लिए. पर डरो मत. अब तक तुम पता नहीं कहाँ होगे. इस शरीर में तो नहीं. तो शुक्र मानो इस आग का जो पीछे छूटे शरीर को ठिकाने लगाएंगी. जिस प्रकृति से उधार लिया था उसे वापस लौटाएँगी. हिसाब बराबर.

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