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Writer, Father. Entrepreneur. Bum. Atheist. Recluse. Garhwali. Foodie. Downloader. Drifter. In no particular order.

14.1.16

अधूरे प्यार का मलबा

जब दो शख्स तारों के महीन काम वाली आसमानी छत के तले ज़मीन के हरे बिछौने पे लेट, या कविता की केसर छिड़के बिना सीधा-सूखा कहें तो किसी सीलन वाली छत के तले बुसी चादर पे लेट एक सपना देखते हैं, जब उनमें से एक शख़्स (यानी मर्द) सपना सच होने से पहले ऊब के या रूठ के अनायास उठ के चल देता है, जब उस अधखिले सपने का ठूंठ उस पीछे छूटे शख्स (यानी मादा) में जमा रह जाता है, तब उस ठूंठ को जड़ सहित बाहर निकालने का, अधूरे प्यार का मलबा साफ़ करने का काम  औरांग का है. 

7.12.15

the lizard king

करीब 14 साल की उमर में मैंने जिम मौरीसन के बारे में पहली बार पढ़ा. याद नहीं कौन से अंग्रेज़ी अखबार की सन्डे मैगज़ीन हुआ करती थी (शायद Sunday Observer). उसकी बेलगाम क्रिएटिविटी और असमय मृत्यु ने मेरे नवयुवा, लेकिन सहज existentialist अंतर्मन पर गहरा प्रभाव डाला. पालिका से उसका पायरेटेड ग्रेटेस्ट हिट्स कैसेट खरीद कर सुना. फिर 1991 में ऑलिवर स्टोन की बायोपिक The Doors आई जिसमें Val Kilmer ने इस darkly enigmatic व्यक्तित्व को जीवंत कर दिया. तो कुछ इस तरह जिम मेरी आतंरिक माइथोलॉजी का एक स्थाई पात्र बन गया.

फिर मैं जैसे जैसे बढ़ा होने लगा, मुझे लगने लगा कि जिम एक फ़क़ीर नहीं बल्कि एक फेकर था. उसकी लिरिक्स भी काफ़ी हल्की तुकबंदी सी प्रतीत होने लगी.

करीब 30 की उमर में मैंने जिम की बायोग्राफी पढ़ी (Jim Morrison: Life, Death, Legend by Stephen Davis). साथ ही मैंने लिरिक्स के परे Doors की Jazz Rock शैली को musically सराहना शुरू किया. अब मुझे जिम कुछ कुछ समझ आने लगा. उसका freewheeling लिरिकल स्टाइल जो सबकौंशस व id को बिना इंटेलेक्चुअल हस्तक्षेप या फ़िल्टरिंग के कागज़ पर उतार देता था, Densmore की jazz drumming, शॉक व theatricality के एलेमेंट्स के बेहतरीन उपयोग के लिए एक नया आदर उपजा. खास तौर पे Morrison Hotel और L.A. Woman एलबम्स के लिए, जिम के भीतर के Adonis, Bacchus, Rimbaud व इण्डियन shaman के अनूठे सम्मिश्रण के लिए.

आज 8 दिसंबर है, जिम का 72वां जन्मदिवस. तो हैप्पी बर्थडे मिस्टर Mojo Risin. May you keep on rising.

8.9.15

पावलोव-श्रोडिंगर

प्यार और दुर्घटना कभी भी हो सकते हैं. और दुर्घटना से बचना तो फिर मुमकिन है. मगर प्यार से? तौबा तौबा !

तो पावलोव जी के कुत्ते को भी हो गया साहब. प्यार, वो भी कतई खूंखार. जब भी पड़ोस के श्रोडिंगर जी की बिल्ली के गले की घंटी सुनाई देती, उसकी लार टप-टप टपकने लगती. कुत्ता-बिल्ली सुन ऐसे काहे चौंक रहे हैं जी? प्यार ने कब जात-पांत, रंग-रूप, योनि-वोनी की हदों को माना है.

मगर श्रोडिंगर जी की बिल्ली बला की शर्मीली. कानों को सुनाई तो दे पर नज़र से नदारद. दिल में तो आये पर पंजों में नहीं.

तो आखिर एक दिन हिम्मत करके पावलोव जी का कुत्ता लार टपकाता, पूँछ हिलाता,घंटी की टन-टन को घात लगाता, श्रोडिंगर जी के घर जा पहुंचा. देखा तो घंटी की आवाज़ एक बक्से से आ रही थी.

कुत्ता अपने अंडकोष ठीक से चाट साफ़ कर बक्से के बगल में एक सभ्य घर के कुत्ते की तरह पिछले पैर समेट कर बैठ गया, और हलके से भौंका, "अजी सुनती हैं मोहतरमा?"

"टन-टन. . ."

"मैं आपसे बेतहाशा मोहब्बत करता हूँ जी."

"टन-टन टन-टन. . ."

"और आप?"      

"टन-टन. . ."

 अब पावलोव जी के कुत्ते का कुत्ता दिमाग फिरने लगा.

"कुछ तो कहिये?"

"टन-टन टन-टन. . ."

"देखिये, ये सरासर बदतमीज़ी है. मैं किसी ऐरे गैरे घर का कुत्ता नहीं, पावलोव जी का कुत्ता हूँ. साइकोलॉजी की हर किताब में मेरा उद्धरण होता है. समझी आप?"

"टन-टन. . ."

"उफ़, ज़िंदा भी हैं या मर गयी?"

"अब ये तो बक्सा खोलने पर ही पता चलेगा न." श्रोडिंगर जी की बिल्ली का जवाब आया.

18.8.15

औरांग का चस्का

औरांग को बचपन से ही ये चस्का लग गया था. जहां ख़याल में डीप फ्राइड चीज़ मिली, बस, उसकी तो लार बहने लगती थी. फिर वो चाहे मिसरों की चमचम वर्की चढ़ी कहानी हो, या लच्छेदार कुरकुरी नॉवल, रदीफ़-काफ़िये की चाशनी में डुबोई ग़ज़ल हो, या कानों में रेशा रेशा घुल जाने वाली नज़्म. या फ़िर नमकीन पे मीठे की पतली परत वाली कविता ही क्यों न हो, जिसको जितनी बार चखो अलग स्वाद आये. शुरू शुरू में तो औरांग नुक्कड़ की दुकान के माल से ही संतुष्ट हो जाता था. पर धीरे धीरे उसका चटोरापन बढ़ता गया. फिर एक दिन उसे चचा गुलज़ार की दुकान मिली, जहां ये सब मिलता था. वो भी कभी शुद्ध देसी उर्दू में बना तो कभी यू.पी. के अचारी हिंदी मसाले में, कभी पंजाबी में छना तो कभी अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों की बुरकन. बस वो दिन है और आज़ का दिन, औरांग आज भी घर जाते समय रास्ते में ही चचा की दुकान से कुछ न कुछ सामान पैक कराता जाता है.                          

22.6.15

पगली की मुस्कान

हम पांचवीं या छठी में पढ़ते थे जब पगली ने सेक्टर 4 के बस अड्डे को अपना घर बना लिया था. वो बस अड्डा हमारे स्कूल के रास्ते में पड़ता था. सेक्टर 3 और सेक्टर 4 के बीच की सड़क के उधर सेक्टर 4 का थाना और इधर पगली का बस अड्डा. जब हम टाइनी टोट्स के बगल वाले मैदान को पार कर कर धूलिया सर के पड़ोस के टेसू के पेड़ के नीचे से हो कर पॉवर स्टेशन को क्रॉस कर सेक्टर 4 की क्रासिंग पर पहुँचते थे तो पगली दिख जाती थी. बस अड्डे पे यूँ आराम से पसरी, मानो उसका लिविंग रूम हो. नज़र मिल जाए तो बच्चों की तरह मुस्करा देती थी. वहीँ बगल में ईंट का अनाड़ी सा चूल्हा. बाल ज़्यादा बढ़ते तो कोई काट जाता था. बड़े साइज़ के मर्दाना कपडे भी शायद कोई न कोई दे जाता था. वैसे तो उस उम्र में हम अपने छोटे से दायरे से बाहर की घटनाओं की ओर तटस्थ रहते थे, ज़्यादा सोचते नहीं थे, मगर पगली हमारे लिए कौतुहल का विषय ज़रूर थी. क्यों न हो. उस ज़माने में पागल घरों में ही झेल लिए जाते थे, उन्हें सड़क छानने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी (अब तो दिल्ली की सड़कों पर कितने ही पगले दीख जाते हैं, जटा दाढ़ी बढाए, जननांग उघाड़े). फिर एक दिन पगली का पेट बढ़ने लगा. हम आते जाते उसका पेट बढ़ते देखते रहे, सोचा नहीं क्यों कैसे. पुलिस थाने को भी शक की नज़र से नहीं देखा. पगली नज़र मिलने पर वैसे ही मुस्कराती रही. तब भी जब दिसंबर के महीने की कड़कड़ाती सर्दी में उसके बढे पेट ने बड़े साइज़ के मरदाना कपड़ों में भी छिपने से इंकार कर दिया. फिर यूँ ही एक दिन वहां से गुजरे तो पगली का पेट फिर समतल था. नज़रें मिली. इस बार पगली मुस्कराई नहीं.

13.5.15

कविता

लेखक यानी वो जो अपने विचारों उद्गारों को लेखनी व शब्दों के माध्यम से कागज़ पे उतार दे. लेखन अक्सर एक प्रोफेशन या एक शौक, या कभी कभी दोनों हो सकता है. मगर कवि कोई भी हो सकता है. कविता तो एक चश्मा है ज़िंदगी को देखने का. दुनिया को चखने का एक तरीका. एक आदत. एक जीवनशैली. फिर कवि के पास कागज़ या समय हो न हो, उसने वोकेबुलरी की दौलत कमाई हो या नहीं, कविता को उस से कोई नहीं छीन सकता. वो खुद भी नहीं.

31.3.15

the importance of being a fool, earnestly

I think I will put on that T-shirt. The bright yellow one with a hood and purple patchwork. The butt-ugly but well worn-in one.

Fall in love again. This time for real. With the right one. Or the same old one.

I think I will pack all that I have. Should fit in one travel bag. Up and leave. Visit somewhere I've never been. Nowhere safe.

Or learn a new skill. Master a new trade. Seek a new job. Found a new shop. Find a new hobby.

I think I'll never learn.

I think I'll just walk off. The sun warming my back. Face north-westwards. Just so. Heed the mountains' hushed call. Land ho.

Walk off that cliff. Like Wile E. Coyote. And keep walking.

I think I will pick a white rose. Pin it on my hat. All dandy like.

Let my dog come along. If it chooses to. Silly dog.

I think I'll stay a fool. For a day. For ever.

23.3.15

भगत

ये ऐसा ही चला आ रहा है. पिछले सौ सालों से, पिछले हज़ार सालों से, कई सदियों से, हमेशा से. ये ऐसे ही चलेगा. बदल ही नहीं सकता. और अगर बदल दें तो, हम बेनामी, सरफ़िरे, अव्यवहारिक, अहमक युवा? यानी क्रांति.

हर कोई आज़ाद हो तो कुछ नहीं हो सकता. लोगों को एकजुट करने के लिए, प्रगति के लिए, सबकी सम्पन्नता के लिए, ये ज़रूरी है कि हम आजादी की तिलांजलि दें. पूरी नहीं, बस थोड़ी. कुछ आवाजों को तो दबाना ही होगा. ज़रूरी है. भरोसा करो उनपे जिनको बागडोर दी है. कुछ समय दो. सवाल मत पूछो.

आज़ादी- सोचने की, अपनी बात को खुल कर कहने की. जब होती है तो नज़र नहीं आती. पर न हो तो? खुद ही गिरवी रख दी हो तो, कुछ पाने के लालच में? भीड़ का हिस्सा बनने के लालच में? कब ये चिड़िया एक समाज, एक देश के हाथ से निकल कर किसी शक्तिपूजक के पिंजरे की कैदी हो जाए, क्या पता.

कैसे उस छोकरे ने इस चिंगारी से आजादी के आईडिया को अपने दिल से लगाया होगा और इतनी हवा दी होगी कि वो धधक धधक कर सब लील गया. एक साधारण युवा मन के सपने, परिवार, प्रेम, और सर्वोपरि- जीजिविषा. यानी किसी भी कीमत पर जीवित रहने की उत्कट इच्छा. कुछ बचा तो उसकी हठ. जैसे गुरुद्वारे का केसरिया झंडा कोसों दूर से दिखता है, जैसे आग की लपटें आसमान को झुलसा देती हैं. वो फांसी चढ़ कर एक लीजेंड बन गया. एक सवाल. एक जवाब. जो वक़्त के साथ धूमिल न हो के, और जलाता है, और जलता है, और चमकता है.      

राम का नाम लें पर सहिष्णुता, करुणा, मर्यादा को धता बता दें. भगत सिंह की बात करें और उस के विचारों को घोल के पी जाएँ, ये कुछ ठीक नहीं.

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा

21.1.15

enter sandman to neverwhere (an author profile and book review of sorts)

Neil Gaiman is the quintessential YA author. Perhaps best known for his cult Graphic Novel series The Sandman, Neil thrives fabulously in the ADD fuelled YA universe. It’s a universe (or is it multiverse?) that exists only partially in reality, while the other half dangles precariously from the fragile strands of dreams. He appears more like a carefully disheveled rock star than a fiction writer. He dabbles with equal ease in media as diverse as comic books, animation, novels, novellas, long stories, short stories, audio books, radio, television and movies. He’s not only a social media enthusiast but goes on to embrace it by interacting with his considerable fan base through his blog and twitter handle. Hell, he’s even married to a neo-feminist-punk-folk-goddess and erstwhile viral sensation Amanda Palmer. And he likes cats. So perhaps, you have to co-habit this half-real, half-virtual world with Neil Gaiman to appreciate him in his entirety. You have to understand that his idols and characters don’t just hail from literary classics but also from the DC and Marvel Universes. You have to accept that he not only cross-references Anglo-Saxon-Irish-Nordic gods and ancient folklore monsters but also gaudily clad superheroes. He’s a mash-up magician, a crossover cook, and I bestow these titles in the most well meaning way. Essentially, there are no boundaries whatsoever in Neil’s carefully crafted phantasm. Once you have assimilated this about Neil, off we go, down the rabbit hole and into a world where gods, monsters, monster-gods and god-monsters, heroes, superheroes and humans of all shapes and sizes jostle for your dreams and nightmares.

You could enter this world through many doors, the most obvious being graphic novels, short story collections and novels-or-novellas. I personally recommend Neverwhere, a creation that you may consume as a television series which was then adapted into a novel, and then adapted into a comic book by the legendary Mike Carey (of ‘Lucifer’ fame). Let’s talk about the novel here.

Neverwhere draws heavily from Alice in Wonderland and the Narnia series in terms of plot structure. But trust me, these are only springboards to leap from. From there, he takes you upon a dark and twisted fairytale journey that’s all his own. The female protagonist is literally called ‘Door’ and, perhaps a tad predictably, acts as a doorway between the modern day London, and a fantastic underground that mirrors and distorts the city above ground. This sub-London is populated by hobos and the forgotten who have fallen through the cracks of the real world, along with several bizarre and quirky characters like the sinister rat-chewing duo of Mr. Croup and Mr. Vandemar, the Rat speakers, the Marquis, the Hunter and the Angel Islington. This world of Neil is characterized by a dark, twisted and vividly visual imagination. You could also count on a deceptive simplicity that appears like a fairytale on the surface but is richly layered with a million hues and textures. Personally, I find the pacing racy, but I guess it may take some acclimatization to the weird crossover universe that Neil hails from. The plots are held together by a gossamer-light dream-logic that quickly evaporates under the harsh sunlight of reason and rhyme. However, the verbal images hit you at a gut level and stay there permanently, expanding and mutating your dream topography forever. If that sounds appetizing to you, I welcome you to the Sandman’s domain. May the American Gods watch over you.






8.12.14

बूट पॉलिश, हरिओम शरण और मेरे पापा

जब कभी बच्चों की स्कूल यूनिफार्म के काले जूते पॉलिश करता हूँ तो अनायास खुद का बचपन याद आ जाता है. शायद सन 1979-80 के करीब की बात रही होगी. मैं 5 या 6 साल का था. हम कनखल की एक पुरानी हवेली में किराए पे रहते थे, गंगा से यही कोई 100 फीट की दूरी पर. घर के सामने घर से भी बड़ा आंगन था, लाल ईंटों के पैटर्न वाला, जो कमरों से ज़्यादा काम आता था. जब हम सुबह सुबह तैयार होते थे तो आकाशवाणी पर भजन चल रहे होते थे. उस समय भजन सम्राट हरिओम शरण 'श्री राधे गोविंदा भज ले, हरि का प्यारा नाम है' और 'श्री रामचंद्र कृपालु भज मन शरण भवभय दारुणम' जैसे लोकप्रिय भजनों के दम पर एयरवेव्स पर एकछत्र राज करते थे. पापा हमारी यूनिफार्म तैयार करते थे, जूते चमकाते थे (पहले BRO के GREF में होने की वजह से उनकी आदतें आज भी थोड़ी फौजीनुमा हैं) और फिर एक हाथ से हमारे दोनों गाल पकड़ दूसरे हाथ से अपनी रीढ़ सी सीधी मांग निकालते थे. फिर हम (बैकपैक नहीं) बस्ता टाँगे नुक्कड़ पे बया के घोंसलों से लकदक लदे पेड़ के नीचे जा खड़े होते थे. उस नुक्कड़ पे चाय की दुकान चलाने वाला रमेश ही हमारा रिक्शाचालक भी हुआ करता था.

अपने पापा से सभी प्यार करते होंगे पर मेरे पापा सचमुच कुछ ख़ास हैं. (थोड़ा शर्मिन्दा हो) सच कहूँ तो आज भी जब पापा साथ होते हैं तो मेरे बच्चों यानी पोता पोती के जूते खुद ही चमकाना पसंद करते हैं.