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22.6.15

पगली की मुस्कान

हम पांचवीं या छठी में पढ़ते थे जब पगली ने सेक्टर 4 के बस अड्डे को अपना घर बना लिया था. वो बस अड्डा हमारे स्कूल के रास्ते में पड़ता था. सेक्टर 3 और सेक्टर 4 के बीच की सड़क के उधर सेक्टर 4 का थाना और इधर पगली का बस अड्डा. जब हम टाइनी टोट्स के बगल वाले मैदान को पार कर कर धूलिया सर के पड़ोस के टेसू के पेड़ के नीचे से हो कर पॉवर स्टेशन को क्रॉस कर सेक्टर 4 की क्रासिंग पर पहुँचते थे तो पगली दिख जाती थी. बस अड्डे पे यूँ आराम से पसरी, मानो उसका लिविंग रूम हो. नज़र मिल जाए तो बच्चों की तरह मुस्करा देती थी. वहीँ बगल में ईंट का अनाड़ी सा चूल्हा. बाल ज़्यादा बढ़ते तो कोई काट जाता था. बड़े साइज़ के मर्दाना कपडे भी शायद कोई न कोई दे जाता था. वैसे तो उस उम्र में हम अपने छोटे से दायरे से बाहर की घटनाओं की ओर तटस्थ रहते थे, ज़्यादा सोचते नहीं थे, मगर पगली हमारे लिए कौतुहल का विषय ज़रूर थी. क्यों न हो. उस ज़माने में पागल घरों में ही झेल लिए जाते थे, उन्हें सड़क छानने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी (अब तो दिल्ली की सड़कों पर कितने ही पगले दीख जाते हैं, जटा दाढ़ी बढाए, जननांग उघाड़े). फिर एक दिन पगली का पेट बढ़ने लगा. हम आते जाते उसका पेट बढ़ते देखते रहे, सोचा नहीं क्यों कैसे. पुलिस थाने को भी शक की नज़र से नहीं देखा. पगली नज़र मिलने पर वैसे ही मुस्कराती रही. तब भी जब दिसंबर के महीने की कड़कड़ाती सर्दी में उसके बढे पेट ने बड़े साइज़ के मरदाना कपड़ों में भी छिपने से इंकार कर दिया. फिर यूँ ही एक दिन वहां से गुजरे तो पगली का पेट फिर समतल था. नज़रें मिली. इस बार पगली मुस्कराई नहीं.

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