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24.11.14

Dogear

कॉमन सेंस कहती है कि याद उस अनुभव को बनना चाहिए जिसमें कुछ खासियत हो. पर ये गलत है. ज़रा सोच के देखिये, खासियत तो तभी नज़र आती है जब आप पीछे मुड़ के देखते हैं, जब आपके पास अतीत के निरीक्षण को एक ऊंची और न्यूट्रल ज़मीन हो. जिस समय आप इसे जी रहे होते हैं तब थोड़े ही पता होता है कि गुजरता समय इस अनुभव को खासियत का तमगा दे देगा. हाँ ठीक है कि ख़ास तीखे मीठे अनुभव अक्सर याद रह जाते हैं, पर ये सच नहीं कि जो याद आये वो हमेशा ख़ास ही हो. मुझे तो ऐसा लगता है कि यादों का कैमरा रैंडम क्लिक मारता है. अमूमन मैं जब भी आँखें बंद करता हूँ मुझे कनखल की खडंजे के पैटर्न वाली छत और एक पतंग याद आती है. क्यों? पता नहीं. इस अनुभव में ख़ास होने लायक कोई भी बात नहीं. फिर भी ऐसा लगता है कि यादों की किताब का ये पन्ना मोड़ कर डॉग-इयर कर दिया गया हो.

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