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3.12.14

हिन्दू vs. मुस्लिम नहीं कट्टरवाद vs. उदारवाद

आजकल मेरे देश में कट्टरवाद की गरम हवा जोर शोर से चल रही है. कट्टरवाद यानी वो सोच जिसके चलते दूसरी सोच रखने वाले की कोई जगह न हो. उसे काफ़िर, अधर्मी, मलेच्छ, नरकगामी आदि करार दे दिया जाए, चाहे बात धर्म की हो, जेंडर की या सेक्सुअल प्रेफेरेंस की.

इस मौसम के चलते आजकल गाहे बगाहे किसी न किसी से इस बात पर ठन जाती है कि यदि आप कट्टर हिंदुत्व का विरोध करते हैं तो कट्टरवादी मुस्लिमों के विरोध में कुछ क्यों नहीं कहते? (साथ में अक्सर- "बस फट गयी मिस्टर sickular libtard" का तमगा भी मिलता है.)

बात पूरी गलत भी नहीं. मेरे पास आंकड़े तो नहीं पर किसी हद तक ये सच लगता है कि मुस्लिम कट्टरवाद ने दुनिया भर में मेनस्ट्रीम इस्लाम की जगह हथिया ली है. उदारवादी मुस्लिम कम दिखते हैं. कभी न कभी उदारवादी मुस्लिमों को कट्टरपंथ और उस से जुडी बुराइयों के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करके इस्लाम की इमेज को सुधारने का काम करना ही होगा. खैर, ये उनकी समस्या है. मेरे लिए ये मुद्दा है ही नहीं.

ये एक यूनिवर्सल सत्य है कि जैसे जैसे इंसान की जानकारी और एक्सपोज़र बढ़ता है, उसके भीतर का कट्टरवाद स्वयं ही कम होता है और उदारवाद बढ़ता है. वो विभिन्न तरह के लोगों को देखता और समझता है तो उन्हें उनकी विभिन्नता के साथ स्वीकार करना भी सीखता है. असल में मुझे तो लगता है कि किसी भी तरफ से चलो एक न एक दिन दिमाग को धर्म की बैसाखी छोड़ आगे बढना ही होगा.

मेरा मुद्दा ये है कि जिस हिंदु धर्म में मैं पल के बड़ा हुआ वो काफी उदारवादी था. हमारे धर्मग्रन्थ केवल हमारे सर पर नहीं बैठते थे, वे हमारे खून में बहते थे. यहाँ तक कि हम तो अपने भगवानों पर चुटकुले भी बना-सुना लेते थे. यही वजह थी कि नास्तिक होने पर भी मैं अपनी पहचान हिन्दू ब्राह्मण ही मानता था. मेरे वाले हिंदु धर्म में हर विचारधारा और जीवनशैली के साथ हिंदु बने रहने का स्कोप था. यही इसकी खासियत थी, यही उसकी महानता थी. पर अब कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है कि हिन्दुओं में भी कट्टरपंथ मेनस्ट्रीम बन रहा है. कुछ दिनों से मेरे धर्म पर छोटे फॉण्ट में 'कंडीशंस अप्लाई' लिखा जाने लगा है. सही कहूँ तो इस के चलते हिन्दू धर्म की महानता बढ़ नहीं घट रही है. कट्टरवाद का विरोध तो उदारवाद से होना चाहिए. वरना हिन्दू धर्म भी कट्टरवादी मुस्लिमों से कुछ अलग नहीं रहेगा. बाकी आपकी मर्जी.

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